Bharat Ki Sanskritik Ekta Essay

31st October को राष्ट्रीय एकता दिवस क्यों मनाया जाता है ? (Why is Rashtriya Ekta Diwas celebrated on 31st October each year) | राष्ट्रीय एकता दिवस महत्व भाषण कविता अनमोल वचन

Rashtriya Ekta Diwas Mahatva, Bhashan, speech, Kavita, Quotes, Slogan in Hindi राष्ट्रीय एकता दिवस महत्व निबंध भाषण कविता इस आर्टिकल को पढ़े एवम शेयर करें क्यूंकि हम युवाओं को ही एक होकर देश को एकता का सबब सिखाना होगा. सबसे पहले परिवारों में एकता को जगाना होगा तभी ही हम देश से एकता की उम्मीद कर सकेंगे.

राष्ट्रीय एकता दिवस (Rashtriya Ekta Diwas)–

भारत की लोह पुरुष कहे जाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है. इस दिन की शुरुवात केन्द्रीय सरकार द्वारा सन 2014 में दिल्ली में की गई है. सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा देश को हमेशा एकजुट करने के लिए अनेकों प्रयास किये गए, इन्ही कार्य को याद करते हुए उन्हें श्रधांजलि अर्पित करने के लिए इस दिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया गया है.

इस दिन का उद्घाटन नई दिल्ली में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने किया था. मोदी जी ने सरदार पटेल जी की प्रतिमा पर मालार्पण किया, साथ ही ‘रन फॉर यूनिटी’ मैराथन की शुरुवात की. इस कार्यक्रम को इसलिए आयोजित किया गया, ताकि सरदार पटेल द्वारा देश को एकजुट करने के प्रयास को देश-दुनिया के सामने उजागर किया जा सके.

राष्ट्रीय एकता दिवस  एवम भाषण (Rashtriya Ekta Diwas Speech In Hindi)

किसी भी देश का आधार उसकी एकता एवम अखंडता में ही निहित होता हैं. भारत देश कई वर्षो तक गुलाम था. इसका सबसे बड़ा कारण था आवाम के बीच एकता की कमी होना. इस एकता की कमी का सबसे बड़ा कारण उस समय में सुचना प्रसारण के साधनों का ना होना था. साथ ही अखंड भारत पर कई संस्कृतियों ने राज किया. इस कारण भारत देश में विभिन्न जातियों का विकास हुआ. शासन बदलते रहने के कारण एवम विचारो में भिन्नता के कारण मतभेद उत्पन्न होता गया और देश में सबसे बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने राज किया और इन्होने इसी कमी का फायदा उठाकर फूट डालों एवम राज करो की नीति अपनाई. इसी एक हथियार के कारण अंग्रेजों से भारत पर 200 वर्षो की गुलामी की.

इससे जाहिर होता हैं कि देश का विकास, शांति, समृद्धि एवम अखंडता एकता के कारण ही संभव हैं. कौमी लड़ाई देश की नींव को खोखला करती हैं. इससे न निजी लाभ होता हैं ना ही राष्ट्रीय हित. आज भी हम कहीं न कहीं एकता में कमी के कारण ही अन्य देशों से पीछे हैं. जाति वाद के दलदल में फँसकर हम देश की एकता को कमजोर कर रहे हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण इतिहास के पन्नो में हैं. सन 1857 की क्रांति के विफल होने का कारण एकता में कमी ही था. मुगुलो ने भी भारत पर शासन एकता की कमी के कारण ही किया था.

इस मतभेद को समझ लेने के बाद ही देश के कई महान स्वतंत्रता सेनानियों ने सबसे पहले इस मुश्किल को कम करने की कोशिश की. कई बड़े- बड़े नेताओं ने आजादी के लिए पहले लोगो को एकता का महत्व बताया. इसके लिए आजादी से पहले समाचार पत्रों एवम रेडिओं प्रसारण का उपयोग किया गया. क्रांतिकारी वीर भले ही जेलों में होते थे,  लेकिन  उस वक्त अपनी कलम के जोर पर उन्होंने देश में एकता का विकास किया. इसी के कारण हमें 1947 में स्वतंत्रता मिली.

  • वर्तमान में एकता का महत्त्व (Ekta Mahatv):

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था, न्याय प्रणाली यह सभी चीजे तब ही सुचारू हो सकेंगी, जब आवाम में एकता हो और जिस दिन यह व्यवस्था सुचारू होगी उस दिन देश के विकास में कोई कठिनाई नहीं होगी.

एकता में सबसे बड़ा बाधक स्वहित हैं आज के समय में स्वहित ही सर्वोपरी हो गया हैं. आज जब देश आजाद हैं आत्म निर्भर हैं तो वैचारिक मतभेद उसके विकास में बेड़ियाँ बनी पड़ी हैं.

आजादी के पहले इस फुट का फायदा अंग्रेज उठाते थे और आज देश के सियासी लोग. हमें यह याद रखना चाहिये कि जिस जगह भी दरार होगी मौका परस्त लोग उसमे अपने लाभ खोजेंगे ही. ऐसी परिस्थती में हमारा ही नुकसान होता हैं.

देश में एकता के स्वर को सबसे ज्यादा बुलंद स्वतंत्रता सेनानी लोह पुरुष वल्लभभाई पटेल ने किया था. वे उस सदी में आज के युवा जैसी नयी सोच के व्यक्ति थे. वे सदैव देश को एकता का संदेश देते थे. उन्ही को श्रद्धांजलि देने हेतु उनके जन्म दिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता हैं.

2017 में कब मनाया जाता हैं राष्ट्रीय एकता दिवस ? (Rashtriya Ekta Diwas 2017 Date) :

लोह पुरुष वल्लभभाई पटेल की स्मृति में उनके जन्मदिन 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता हैं.

राष्ट्रीय एकता दिवस का ऐलान 2014 में किया गया, इसे वल्लभभाई पटेल के राष्ट्र के प्रति समर्पण को याद में रखकर तय किया गया, इसका ऐलान गृहमंत्री राज नाथ सिंह ने किया.

राष्ट्रीय एकता दिवस मनाने का तरीका (Rashtriya Ekta Diwas Celebration)

2014 के बाद से 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस के बारे में जागरूकता बढ़ाने और महान व्यक्ति को याद करने के लिए राष्ट्रव्यापी मैराथन का आयोजन किया जाता है. इस दिवस के साथ देश की युवा पीढ़ी को राष्ट्रीय एकता का सन्देश पहुँचता है, जिससे आगे चलकर वे देश में राष्ट्रीय एकता का महत्व समझ सकें. इस मौके पर देश के विभिन्न स्थानों में कई कार्यक्रमों का आयोजन होता है. दिल्ली के पटेल चौक, पार्लियामेंट स्ट्रीट पर सरदार पटेल की प्रतिमा पर माला चढ़ाई जाती है. इसके अलावा सरकार द्वारा शपथ ग्रहण समारोह, मार्च फ़ास्ट भी की जाती है.

‘रन फॉर यूनिटी’ मैराथन देश के विभिन्न शहरों, गाँव, जिलों, ग्रामीण स्थानों में आयोजित की जाती है. स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, अन्य शैक्षणिक संसथान, राष्ट्रीय कैडेट कोर,  राष्ट्रीय सेवा योजना के लोग बहुत बढ़ चढ़ कर इस कार्यक्रम में हिस्सा लेते है. दिल्ली में राजपथ में विजय चौक से इंडिया गेट के बीच सुबह 8:30 बजे मैराथन का आयोजन बहुत बड़े स्तर पर होता है, जिसमें कई नेता, अभिनेता हिस्सा लेते है. इसके अलावा सरकारी ऑफिस, पब्लिक सेक्टर में भी शपथ ग्रहण कार्यक्रम होता है. स्कूल कॉलेज में तरह तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते है, वहां बैनर, पोस्टर बनाने की प्रतियोगिता, निबंध, भाषण, पेंटिंग, कविता, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता आदि का आयोजन होता है.

सरदार पटेल जन्म31 अक्टूबर 1875
मृत्यु15 दिसम्बर 1950
राष्ट्रीय एकता दिवस की शुरुवात31 अक्टूबर 2014
किसके द्वारा शुरू हुआप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के द्वारा

राष्ट्रीय एकता दिवस् का महत्व : (Rashtriya Ekta Diwas Importance)

आज देश के युवाओं को यह समझाने की जरुरत हैं कि एकता देश के लिए कितनी जरुरी हैं. ऐसे में राष्ट्रीय एकता दिवस का होना बेहद जरुरी हैं. ऐसे दिन ही युवाओं को इस दिशा में सोचने के लिए प्रेरित करते हैं.

आज के समय में एकता इस तरह खंडित हो चुकी हैं कि इसका महत्व सबसे पहले परिवार जो कि समाज की सबसे छोटी इकाई हैं, को समझना चाहिये क्यूंकि आज परिवारों में ही एकता नहीं हैं. इसी कारण समाज में एकता नही हैं और अगर समाज में एकता नहीं होगी तो गाँव, शहर, राज्य एवम देश में कैसे हम एकता की उम्मीद रख सकेंगे.

एकता के लिए जरुरी हैं आज की पीढ़ी एवम पहले की पीढ़ी आपसी विचारों को व्यक्त करे, एवम एक दुसरे को अपनी-अपनी स्थिती से अवगत करायें. साथ ही एक हल की उम्मीद में ही बातचीत शुरू की जाये. पीढ़ियों में जो विवाद होता हैं उसका कोई हल नहीं होता हर व्यक्ति अपने आपको सही मानता हैं ऐसे में परिवार टूट जाते हैं इसलिए जरुरी हैं कि बातचीत हो एवम ऐसा वातावरण हो कि परिवार का हर एक सदस्य अपनी बात कह सके और हल ढूंढा जा सके. परिवारों का टूट जाना तो आसान हैं. उनका एक साथ रहना मुश्किल हैं और इन टूटे हुए परिवारों का प्रभाव देश पर भी पड़ता हैं.

अगर हम सभी विकास चाहते हैं तो प्रधानमंत्री मोदी जी के उस नारे को ध्यान में रखे जिसमे उन्होंने कहा हैं सबका साथ सबका विकास.

मैंने जो परिवार का उदाहरण आपके सामने रखा शायद आप उसे राष्ट्रीय एकता से न जोड़ पाये, लेकिन मेरा मानना तो यही हैं कि जब तक परिवारों में एकता नहीं होगी, तब तक देश में एकता नहीं हो सकती और जब तक एकता नहीं होगी, तब तक विकास की गति अवरुद्ध एवम दिशाहीन होती रहेगी.

इस प्रकार आज के समय में राष्ट्रीय एकता दिवस का होना जरुरी हैं.

राष्ट्रीय एकता दिवस स्लोगन नारे अनमोल वचन (Rashtriya Ekta Diwas Slogan Quotes)

  • एकता – मूलमंत्र हैं यह विकास का, देश के सौंदर्य और उद्दार का

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  • हर एक शब्द भारी हैं, जब एकता में देश की हर कौम सारी हैं.

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  • एकता ही देश का बल हैं, एकता में ही सुनहरा पल हैं.

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  • जब तक रहेगी साठ गाठ, होता रहेगा देश का विकास.

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  • याद रखो एकता का मान, तब ही होगी देश आन.

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  • एकता में ही संबल हैं जिस देश में नही वो दुर्बल हैं.

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राष्ट्रिय एकता दिवस पर कविता  (Rashtriya Ekta Diwas Kavita)

राष्ट्र की एकता ही हैं उसका आधार
न थोपों उस पर सांप्रदायिक विचार
क्यूँ करते हो भेद ईश्वर के बन्दों में
हर मज़हब सिखाता हैं प्रेम बाँटो सब में
क्यूँ करते हो वैचारिक लड़ाई
बनता हैं यह भारत माँ के लिए दुखदाई
एक भूमि का टुकड़ा नहीं हैं मेरा देश
मेरी माँ का हैं यह सुंदर परिवेश
इसके उद्धार में ही हैं अलौकिक प्रकाश  
सबके साथ में ही हैं सबका विकास
एकता ही हैं अंत दुखों का
एकता में ही हैं कल्याण अपनों का

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मैं नहीं तू, तू नहीं मैं
कब तक चलेगा ये मतभेद
कैसे अनपढ़ हैं कहने वाले
जो देश को सांप्रदायिक सोच देते हैं
फूट डालो और राज करो
कैसे वो ये नारा भुला बैठे हैं
अंग्रेज हो या कोई हमने ही तो अवसर दिया
आपसी लड़ाई में हमने मातृभूमि को गँवा दिया
आज भी उसी सोच के गुलाम हैं हम
खुद ही अपने देश के शत्रु बन रहे हैं हम
फिर से कही मौका न दे बैठे
चलो सुलझाये और आज साथ आकर बैठे

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Karnika

कर्णिका दीपावली की एडिटर हैं इनकी रूचि हिंदी भाषा में हैं| यह दीपावली के लिए बहुत से विषयों पर लिखती हैं |यह दीपावली की SEO एक्सपर्ट हैं,इनके प्रयासों के कारण दीपावली एक सफल हिंदी वेबसाइट बनी हैं

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भारत की सांस्कूतिक एकता | Essay on Cultural Unity of India in Hindi!

भौगोलिक दृष्टि से भारत एक संगठित इकाई के समान है । भारत के आकार और क्षेत्रफल को देखते हुए यह कहा जाता है कि यह एक देश की अपेक्षा एक द्वीप लगता है ।

यह यूरोप जितना विस्तृत है और इसका क्षेत्रफल ग्रेट ब्रिटेन से बीस गुणा अधिक है । अपनी विविध भौतिक विशेषताओं और सामाजिक परिस्थितियों के कारण भारत एक छोटे विश्व के समान है । सामान्य तौर पर अवलोकन करने वाले विचारक भारतीय सांस्कृतिक विविधता को संदेह की दृष्टि से देखते हैं ।

वे अनेकता में एकता की विशेषता को समझने में असमर्थ हैं । उनके मत में भारत छोटे-छोटे वर्गो में क्या हुआ देश है । भारत वर्गो, जातियों, सम्प्रदायों में विभाजित होने के बावजूद एक सांस्कृतिक सूत्र में बँधा हुआ है जिसे समझने के लिए व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है ।

संकीर्ण विचारधारा वाले लोग भारतीयों की मूल एकता को देख नहीं पाते हैं । यह भिन्नता भारत की कमजोरी नही उसकी शक्ति और मुख्य निधि है । प्रो. हरबर्ट रिसले के अनुसार भारत का भौतिक और सामाजिक रूप, भाषा, रीति रिवाज, धर्म की भिन्नता होने पर भी कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एकता के सूत्र में बंधा है ।

यह एकता है सांस्कृतिक एकता, जिसने भारत की विविधता को अपने में समोकर अभिन्न रूप प्रदान किया है । पाश्चात्य विचारक वी. ए. स्मिथ ने भारत में काफी समय व्यतीत किया, उनके अनुसार भारत की संस्कृति की अपनी विशिष्टताएं है, जो उसे विश्व के अन्य देशों से पृथक करती है, लेकिन इस विविधता का प्रभाव भारत की सांस्कृतिक एकता पर नहीं पड़ता है ।

भारत के इतिहास से भी यह ज्ञात होता है कि भारत में लोगों की राजनैतिक जागरूकता ने समस्त भारत को एकता के सूत्र में बांधे रखा । भारत भौगोलिक रूप तथा लोगों के रहन-सहन की दृष्टि से भिन्न है, लेकिन आंतरिक रूप से यह अभिन्न है ।

भारत में अलग-अलग जातियाँ उपजातियाँ, धर्मो के लोग, राष्ट्रवादी और साम्यवादी रहते हैं, लेकिन उनका मन एक है । हम सबका संबंध एक अमूल्य संस्कृति से है । सदियों पहले से विकसित कला और साहित्य में हमारी संस्कृति की झलक दिखाई देती है । हमारी सांस्कृतिक परम्परा हमारे देश के भिन्न-भिन्न मतों, विश्वासों के लोगों को एकता के सूत्र में बाँधती है ।

भारत जैसे उपमहाद्वीप में विभिन्न मतों और संस्कृतियों की लहर हमारे वर्तमान और भविष्य की ओर इंगित करती है । आयो के आगमन से पहले यहाँ द्रविड़ जाति रहती थी, इस प्रकार हिन्दू समाज दक्षिण और उत्तर की संस्कृतियों का मिला-जुला रूप है ।

भारत की लगभग एक सौ पचास बोलियाँ है और 15 राजभाषाएँ हैं । परन्तु हिन्दी यहाँ की प्रमुख भाषा है । कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी, बम्बई से लेकर नागालैंड तक यह भाषा सबसे ज्यादा बोली और समझी जाती है । आज हिन्दी को भारत की राजभाषा माना जाता है । यह सभी प्रान्तों के लोगों को एक भाषा के सम्पर्क सूत्र में बाँधती है ।

भारत की सांस्कृतिक परम्परा बहुत सम्पन्न है । संगीत, ललित कला, नश्त्य, नाटक, रंगमंच और शिल्पकला आदि सभी सांस्कृतिक परम्परा से प्राप्त हुए है । आध्यात्मिक उन्नति, इच्छाओं के दमन, व्रत अनुष्ठान आदि की दृष्टि से भी हमारा देश महान है । हमारे ऋषि, मुनियों ने उस अदृश्य सत्ता के ज्ञान की आकांक्षा की है । हमारे धार्मिक ग्रंथ आध्यात्मिक ज्ञान के भंडार है ।

हमारी सांस्कृतिक परम्पराओं की उत्कृष्टता के कारण ही आज पश्चिमी देश हमारे आगे नतमस्तक हो जाते है । अमेरिका और यूरोप के लोग भारतीय जीवन पद्धतियों को अपना रहे हैं । भारतीय साधुओं, ऋषियों, संगीतज्ञों, आध्यात्मिक गुरूओं के प्रति वे आकर्षित होते हैं ।

भारतीय संस्कृति और उसके संदेश को दूसरे देशों तक पहुँचाने का सफलतम उपाय विश्व के विभिन्न देशों में सांस्कृतिक उत्सवों, भारत उत्सव आदि का आयोजन है । पश्चिमी लोग हमारे आध्यात्मिक मूल्यों जैसे ध्यानावस्था, उपासना, दया, प्रेम आदि का आयोजन है ।

पश्चिमी लोग हमारे आध्यात्मिक मूल्यों जैसे ध्यानावस्था, उपासना, दया, प्रेम, मैत्री –बंधुत्व, ईश्वर का डर, श्रद्धा और निस्वार्थ भावनाओं का नियंत्रण, मानसिक शांति आदि की प्राप्ति की ओर बढ रहे हैं । इन आध्यात्मिक मूल्यों का संबंध हमारी उच्च संस्कृति से है ।

हमारी सांस्कृतिक एकता के अन्य उदाहरण दक्षिण भारत के मंदिर, खजुराहों, अजन्ता और एलोरा की गुफाएँ हैं । ये भारत की उदात्त शिल्प कला और वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं । भारतीय संगीत ने भी विश्व में अपना स्थान बना लिया है । भारतीय शास्त्रीय संगीत, भारतीय नृत्य राग और ताल में निबद्ध है ।

ऐसा माना जाता है कि दक्षिण और उत्तर की शैली को मिलाकर भारत में लगभग 250 राग प्रचलित है । रविशंकर जैसे महान संगीतज्ञों ने भारतीय संगीत द्वारा पूर्व और पश्चिम के संगीत के बीच सेतु का निर्माण किया है । भारतीय सांस्कृतिक एकता की एक अन्य विशेषता नृत्यों में शैली विभिन्नता और भावात्मक सम्पन्नता है ।

शास्त्रीय नृत्यों, लोक नृत्यों और कबीलों, प्रान्तों के द्वारा हमारी कलात्मक अभिव्यक्ति, आध्यात्मिक उच्चता प्रकट होती है । इसी प्रकार भारतीय रंगमंच का इतिहास भी दो हजार वर्ष पुराना है । पहले नाटकों का मंचन मंदिरों, राजमहलों में होता था । पारम्परिक नाटकों में तो संगीत और नृत्य का सम्मिश्रण भी किया जाता था । दुर्भाग्यवश अब इसे प्रोत्साहित नहीं किया जा रहा हैं ।

हमारी सांस्कृतिक एकता की महानता के कारण ही आज पश्चिमी लोग इसके प्रति आकर्षित हो रहे हैं । देश की युवा पीढ़ी का दायित्व है कि वह सांस्कृतिक एकता को दृढ़ करने के प्रयास करे और उन्नति का मार्ग प्रशस्त करें, ताकि विश्व के सम्मुख आदर्श प्रस्तुत हों ।

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